Saturday, July 4, 2009

प्रेम

जो प्रेम को उपलब्ध होता है, वह भय से मुक्त हो जाता है।

एक युवक अपनी नववधु के साथ समुद्र-यात्रा पर था। सूर्यास्त हुआ, रात्रि का घना अंधकार छा गया और फिर एकाएक जोरों का तूफान उठा। यात्री भय से व्याकुल हो उठे। प्राण संकट में थे और जहाज अब डूबा, तब डूबा होने लगा। किंतु वह युवक जरा भी नहीं घबड़ाया।

उसकी पत्नी ने आकुलता से पूछा, 'तुम निश्चिंत क्यों बैठे हो? देखते नहीं कि जीवन बचने की संभावना क्षीण होती जा रही है! 'उस युवक ने अपनी म्यान से तलवार निकाली और पत्नी की गर्दन पर रखकर कहा, 'क्या तुम्हें डर लगता है?'

वह युवती हँसने लगी और बोली, 'तुमने यह कैसा ढोंग रचा? तुम्हारे हाथ में तलवार हो, तो भय कैसा!' वह युवक बोला, 'परमात्मा के होने की जब से मुझे गंध मिली है, तब से ऐसा ही भाव मेरा उसके प्रति भी है, तो भय रह ही नहीं जाता है।'

प्रेम अभय है। अप्रेम भय है। जिसे भय से ऊपर उठना हो, उसे समस्त के प्रति प्रेम से भर जाना होगा। चेतना के इस द्वार से प्रेम भीतर आता है, तो उस द्वार से भय बाहर हो जाता है।

Saturday, June 13, 2009

माँ खादी की चादर दे दे ......

माँ खादी की चादर दे दे मैगाँधी बन जाऊंगा ,
सब मित्रो आनंद बीच बैठ कर रघुपति राघव गाऊंगा;
माँ खादी की चादर दे दे मैगाँधी बन जाऊंगा
छूत अछूत नही मानूंगा सब को अपना ही जानूंगा ,
एक मुझे तू लाठी लादे टेक उसे बढजाऊंगा ,
माँ खादी की चादर दे दे मैगाँधी बन जाऊंगा
घड़ी कमर में लटकाऊंगा सैर सबेरे कराऊंगा ,
मुझे रुई की पोनी लादे तकली खूब चलाऊंगा,
माँ खादी की चादर दे दे मैगाँधी बन जाऊंगा
गाँव में ही रहा करूँगा भले कम में किया करउगा ,
- - - - - - - - - - - -'' '' - - - - - -- - -- - - - -,
माँ खादी की चादर दे दे मैगाँधी बन जाऊंगा

Wednesday, May 20, 2009

जड़ता...

आदते मनुष्य की चेतना को दबा देती है जिस मनुष्य को आत्मा को उपलब्ध होना हो उसकी उतनी ही कम आदते होनी चाहिए , उसके उतने ही कम बंधन होने चाहिए , उसकी उतनी ही कम जड़ता होनी चाहिए
संवेदना का क्या अर्थ है ,सेंसेटिव होने का क्या अर्थ है , उसका प्रयोजन यह है कि , जितनी कम जड़ता हो उतनी जादा मनुष्य आनंद भीतर संवेदना कि शक्ति जाग्रत होगी और जितनी जादा जड़ता हो उतनी संवेदना कि शक्ति शून्य हो जाती है , और संवेदना कि शक्ति जितनी गहरी हो हम सत्य को उतनी ही गहराईतक अनुभव करपयेंगे और संवेदना कि शक्ति जितनी कम हो जायेगी , उतना ही हम सत्य से दूर होजाएंगे जो धार्मिक है ,वह स्मरण रख्नेकि धर्म उनकी आदत न बन जाए कंही धर्म भी उनकी एक जड़ता न बन जाए कि वह सुबह रोज मन्दिर जाए ,नियत समय पर मन्दिर जाए ,एक नियत मंत्र पड़े ,एक नियत देवता आनंद आगे हट झुकाए ,यह कंही उनकी जड़ आदत न हो , और यह सच है कि सौ में से निन्यानवे मौके पर यह एक जड़ आदत है ,और यह आदती बेहतर नही और यह आदत ठीक नही फिर यह भी याद स्मरण रखे आपने दूसरो की आज्ञाओं स्वीकार करली है और आप उनके अनुसार वर्तन कर रहे है , उनके अनुकूल आचरण कर रहे है यह भी जड़ता को अंगीकार करलेना है जब भी कोई आज्ञा दे और आप स्वीकार कर ले तो आप कि चेतना भीतर छीड़ हो जाती है , जब भी कोई कुछ कहे और आप स्वीकार करलेते है ,आपके भीतर कि चेतना जड़ होने लगती है समाज कहता है ,संस्कार कहते है ,पुरोहित कहते है हजारो वर्षो कि उनकी परम्परा है,उसके बजन पर कहते है उछारण करते है शास्त्रों का कि यह ठीक है और हम उसे मन लेते है ,और उसे स्वीकार करलेते है धीरे-धीरे हम स्वीकार मात्र पर टिके रह जायेंगे ,और जो हमारा स्फुरण होना चाहिए था जीवन का ,वह बंद हो जाएगा जीवन आनंद स्फुरण आनंद लिए जरूरी है कि वह वक्ती आज्ञाओं आनंद पीछे नही बल्कि स्वयं आनंद विवेक आनंद पीछे चले जीवन स्फुरण लिए जरुरी है कि जो-जो चीजे जड़ करती हो ,वक्ती अपने को उनसे मुक्त करले

Saturday, May 16, 2009

अनुकरण नही आत्मखोज....

जब भी मनुष्य किसी दूसरे जैसे होने की कोशिश करता है तभी वह अन्तः द्वंद में , एक कांफिलिक्ट में ,एक परेशानी में पड़ जाता है जो वह है वो उसे तो भूल जाता है और जो होना चाहता है उस की कोशिश पैदा करलेता है इस भांति उसके भीतर एक बेचैन ,एक अशांति और एक संघर्ष पैदा हो जाता है
परमात्मा को केवल वे ही पा सकते है जो शांत होजो अशांत है वे कैसे पासकेंगेजो भी किसी की नक़ल में कुछ होना चाह रहा है ,वह अनिवार्यतयाअशांत हो जाएगा उसकी अशांति उसे परमात्मा आनंद पास नही पहुँचा सकेगी अगर जूही का फूल गुलाब होना चांहे , तो जैंसी बेचैनी और परेशानी में पड़ जायेंगे वैसी बेचैनी और परेशानी में हम पड़ जाते है , जब हम किसी का अनुकरण करते है इसलिए मैं कहना चाहता हु कि अनुकरण नही आत्मखोज मैंने फली बात आप से कही श्रधा नही, जिज्ञासा दूसरी बात कहना चाहता हूँ अनुकरण नही आत्न्खोज कोई किसी के लिए आदर्स नही है प्रत्येक व्यक्ति का आदर्स उसके अपने भीतर छिपा है ,जो उघाड़ना है , और उसे हम नही उघडते और किसी पीछे जाते है तो हम भूल में पड़ जायेंगे ,हम भटकन में पड़ जायेंगे और में आप से कंहू की आप लाख उपाय करे , आप कभी कृष्ण ,बुद्ध नही बन सकोगे -